के.एम.अग्रवाल
भारत और नेपाल के संबंध इन दिनों नाजुक मोड़ पर हैं। वजह वहां के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली का श्रीराम और अयोध्या के बारे में दिया गया बयान है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन सबके पीछे का षडयंत्रकारी चीन है जिसके प्रभाव के कारण ओली इस तरह के ऊल जलूल बयान देकर आपसी संबंध बिगाड़ने के अभियान में लगे हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली पिछले लगभग एक महीने से लगातार कुछ ऐसी कारवाई कर रहे हैं अथवा बयान दे रहे हैं, जो भारत के न सिर्फ खिलाफ है, बल्कि नेपाल और भारत दोनों देशों के बीच तनाव पैदा करने के साथ-साथ दोनों के बीच जो सैकड़ों वर्षों से सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध है, उनमें भी दरार डाल रहे हैं।
दो दिन पहले ओली के इस बयान ने कि असली अयोध्या नेपाल में है, न सिर्फ भारतीयों के विश्वास और आस्था को चोट पहुँचाया है, बल्कि अब तो सामान्य और पढ़े-लिखे नेपाली भी उनके बयान का विरोध करने लगे हैं। इस प्रकार वह स्वयं अपने ही देश में घिर गये हैं। अयोध्या के संतों ने जहाँ ओली के बयान का विरोध करते हुए उसे राजनीतिक षडयंत्र बताया है, वहीं वाराणसी के संतों ने ओली को शास्त्रार्थ करने की चुनौती देते हुए कहा है कि भारत स्थित अयोध्या ही भगवान श्रीराम का जन्मस्थान है, जो हर प्रकार से सिद्ध हो चुका है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी सप्रमाण इसपर मोहर लगा दिया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महंत ने तो भारतीय प्रधानमंत्री से माँग की है कि वे नेपाली प्रधानमंत्री से इस संदर्भ में कड़ा विरोध व्यक्त करें। पुनः भारतीय धर्म ग्रन्थों में स्पष्ट लिखा है कि अयोध्या सरयू तट पर है, जबकि नेपाल में कोई सरयू नदी नहीं है।
एक बात काफी समय से कही जा रही है कि चीन ने अपने राजनीतिक, कूटनीतिक जाल में नेपाल के प्रधानमंत्री ओली को फंसा रखा है। उसके दबाव में ही ओली ने पहले सीमा विवाद शुरू किया और कुछ भारतीय हिस्से को नेपाल का नया नक्शा बनाकर नेपाल में दिखा दिया। इतना ही नहीं, भारत के विरोध के बावजूद इस नये नक्शे को संसद में भी पास करवा लिया। अभी कुछ दिनों पहले ओली ने भारतीय सीमा के निकट अपनी सेना भी तैनात कर दी थी, जिसे विरोध होने के बाद फिर हटा लिया था। नेपाली रक्षा मंत्री ने तो युद्ध की चुनौती तक दे डाली थी।
पिछले काफी समय से नेपाल की सत्तारूढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड और प्रधानमंत्री ओली के बीच सत्ता को लेकर खींचतान चल रही है। यह खींचतान इतनी बढ़ गयी कि प्रचंड ने सीधे ओली से इस्तीफे की माँग कर डाली। प्रचंड को ऐसा विश्वास है कि पार्टी में बहुमत उनके साथ हो जायेगा। प्रचंड और ओली के बीच समझौता हो जाय, इसके लिए दो बार दोनों के बीच बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन कोई बात नहीं बनी। आगामी 17 जुलाई को पार्टी की स्थाई समिति की बैठक होने जा रही है। समझा जाता है कि इस बैठक में कुछ निर्णायक फैसला हो सकता है, क्योंकि प्रचंड, ओली के खिलाफ लगातार दबाव बनाये हुए हैं।
ओली का यह कहना कि उनके विरोधी, भारत की मदद से उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की कोशिश कर रहे हैं, जो सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है। वैसे पहले का अनुभव बताता है कि आज जैसे ओली चीन की गोद में बैठे हुए हैं, उसी प्रकार कभी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचंड भी चीन की गोद में बैठकर भारत के विरोध में बोलते थे।
जहाँ तक अयोध्या का प्रश्न है, कुछ समय पहले भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने भारत से नेपाल के जनकपुर तक बस चलवाई थी और उस बस की अगुवाई ओली ने की थी। तब उन्होंने जनकपुर को भगवान राम का ससुराल बताया था। फिर अब अयोध्या कहाँ है, इसपर प्रश्न उठाने का क्या मतलब ? और अब जब ओली के बयान के बाद भारत सहित नेपाल में भी उनका विरोध होने लगा तो नेपाल का विदेश मंत्रालय यह कहकर उसे सुधारने की कोशिश कर रहा है कि प्रधानमंत्री ओली के बयान का मकसद किसी की आस्था को चोट पहुँचाना नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने भी ओली के बयान की आलोचना करते हुए कहा है कि ऐसे फालतू बयान से नेपाल के लिए परेशानी ही पैदा होती है।
नेपाल में स्थित जनकपुर के संदर्भ में 2 दिसम्बर, 1815 को अंग्रेजों और नेपाल के बीच हुई सुगौली संधि काफी महत्व रखती है। संधि के बाद 4 मार्च, 1816 को जहाँ कुमायूँ और गढ़वाल आदि क्षेत्र भारत को मिले, वहीं श्रावस्ती, भैरहवां, कपिलवस्तु और जनकपुर आदि कुछ क्षेत्र भारत से नेपाल को मिल गये। सभी जानते हैं कि भारत और नेपाल के बीच एक जमाने से रोटी-बेटी का संबंध है। बहि बड़ी संख्या में नेपाल के तराई क्षेत्र में बसे मद्धेशिया, जो भले ही नेपाली नागरिक हों, भारत-नेपाल के बीच अच्छे संबंध के हमेशा पक्षधर रहे हैं।यह स्वयं में बहुत ही महत्वपूर्ण है।
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और महराजगंज उ प्र में रहते हैं। यह जिला नेपाल सीमा पर स्थित है)





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