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ओली भाग क्यों रहे है ?

के.एम.अग्रवाल
 
 नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली के स्वयं अपनी पार्टी की 45 सदस्यीय स्थाई समिति की 21 जुलाई की बैठक में भाग न लेना साफ दर्शाता है कि वह समझ गये हैं कि पार्टी में उनका बहुमत नहीं रह गया है। जबकि यह बैठक उनकी सहमति से उन्ही के प्रधानमंत्री आवास पर बुलाई गयी थी। इतना ही नहीं वह यह भी समझ गये हैं कि सत्ता की इस लड़ाई में वह अपने धुर विरोधी पार्टी के सह अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड से लड़ाई हार चुके हैं। अब यह सिर्फ कुछ दिनों की बात है, जब ओली को प्रधानमंत्री की कुर्सी से त्यागपत्र दे देना होगा। नेपाल की राष्ट्रपति भी अब भीतर-भीतर उनकी मदद नहीं कर पा रही हैं।
 पिछले महीने-दो महीने से प्रधानमंत्री ओली के, चीन की सह पर लगातार भारत विरोधी बयान से जब न सिर्फ भारत में, बल्कि नेपाल में भी ओली का विरोध होने लगा तो उनके विरोधी और पहले से ही घात लगाये बैठे प्रचंड को मौका मिल गया कि ओली इस्तीफा दें और उन्होंने खुलेआम इस्तीफा माँगना शुरू भी कर दिया। ओली के विरोध में पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई के अतिरिक्त नेपाल का मद्धेशिया समाज और हिन्दूवादी संगठन के भी मैदान में आ जाने से स्थिति काफी नाजुक हो गयी।
 ओली के भारत विरोधी बयानों  से भारत में रहने वाले गोरखा और दूसरे नेपाली भी स्वयं को काफी असहज महसूस करने लगे। इन गोरखाओं के संगठन 'गोरखा इंटरनेशनल सोसाइटी कल्चर फाउन्डेशन' ने तो गत दिनों नीदरलैंड में स्थित अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में जनहित याचिका भेजकर माँग कर डाली कि नेपाल में भारत के विरोध को रोका जाय तथा नेपाल के जिन ग्यारह गाँवों पर चीन ने कब्जा टर लिया है, उसे नेपाल को वापस दिलाया जाये। इस संगठन के अध्यक्ष ज्योति प्रसाद विष्ट ने बयान दे डाला कि ओली व्यक्तिगत कारणों से भारत-नेपाल  के बीच दरार पैदा कर रहे हैं तथा नेपाल को चीन के हाथों सौपने का षडयंत्र कर रहे हैं।
 नेपाल से साफ संकेत मिल रहे हैं कि प्रचंड, ओली को प्रधानमंत्री पद से हटाने से कम कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। दोनों के बीच अब तक आठ बार बैठकें हो चुकी हैं, जिससे कि आपसी मतभेद दूर हो सके लेकिन ओली एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को भी मानने को तैयार नहीं हैं। प्रचंड का गुट पहले ओली से पार्टी का अध्यक्ष पद लेना चाहता है और तब फिर उन्हें  प्रधानमंत्री पद से हटाना आसान हो जायेगा। इस बात को समझते हुए ही ओली अपनी पार्टी एन.सी.पी. का अध्यक्ष पद नहीं छोड़ना चाहते और न ही पार्टी की  स्थायी समिति की बैठक में किसी विरोधी प्रस्ताव का सामना करना चाहते हैं।
 एक प्रकार से ओली अपने ही बुने जाल में फँस चुके हैं। चीन से अधिक से अधिक लाभ लेने के चक्कर में वह उसकी गोद में बैठते गये। वह यह नहीं समझ सके कि जब उन्हीं की पार्टी में बहुमत उनके विरोध में होगा, तो चीन कहाँ तक उनकी कुर्सी सुरक्षित रख सकेगा ? नेपाल के नागरिक तथा दूसरी पार्टियाँ चीन की विस्तारवादी नीति को समझने लगी हैं। ऐसी स्थिति में ओली का प्रधानमंत्री पद से हटना हर प्रकार से नेपाल के हित में होगा। जहाँ तक भारत से संबंधों का प्रश्न है, ओली ने संबंध तो बिगाड़ ही लिए हैं। सबसे गलत काम तो उन्होंने भारतीय भूमि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नये नेपाली नक्शे में नेपाली क्षेत्र दिखाकर और उसे जल्दबाजी में संसद से पास करा कर किया है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसपर कभी कोई समझौता भारत नहीं कर सकेगा। 
 पुनः ओली ने नये नागरिक कानून को पास कराकर लाखों की संख्या में नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले मद्धेशिया समुदाय को नाराज कर दिया है। मद्धेशिया समुदाय इस कानून को कभी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि इससे उनकी नागरिकता प्रभावित होती है।
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