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दुनिया में सबकुछ एक दूजे से जुड़ा हुआ है। सनातन विचार से न सिर्फ संसार के सभी प्राणी बल्कि उन्हें चलाने वाली व्यवस्थाएं भी एक-दूसरे से गुंथी हुई हैं। गांधी और दीनदयाल, दोनों इन दिनों रह-रहकर याद आ रहे हैं।  सत्य ,अहिंसा ,अपरिग्रह, सादगी, ब्रह्मचार्य,शुचिता जैसे एकादश व्रत महत्वपूर्ण हो गए हैं । वहीं लाइन में खड़े आखिरी व्यक्ति से लगाकर अमीरों की सूची में दिखाए जाने वाले शीर्षस्थों को बांधने वाली अखंड मंडलाकार व्यवस्था की जरूरत भी रेखांकित हो रही है।
 कोविड-19 ने पूरी सभ्यता को झिंझोड़ कर रख दिया है। यदि लोगों और उनसे जुड़ी संस्थाओं को अपना वजूद बनाए रखना है तो खुद को बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा। अब इस बदलाव की आहट सुनी जा सकती है। संसदीय लोकतंत्र, सहभागिता और सहकार की बुनियाद पर टिका हुआ है। उसे नई परिस्थिति में ढालने का वक्त आ पहुंचा है ।जो लोग इसे महज एक महामारी के तौर पर देखते हैं वह कह सकते हैं कि बस चंद महीनों की बात है ।उन्हें लगता होगा कि दीगर बीमारियों की तरह इसका इलाज ढूंढ लिया जाएगा ,टीका विकसित होगा या बचे हुए लोगों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाएगी।इन उम्मीदों  के सच होनेपर भी कोविड-19 के सबक मानवता को सीखने होंगे ।मसलन शासन व्यवस्था बदलेगी, जनप्रतिनिधियों और सरकार चलाने वाले लोगों से उम्मीदें नए सिरे से परवान चढ़ेगी। भाषण वीर नेताओं को अब संसद और विधानसभाओं में अधिक कुशल, संयत और नतीजे देने वाले नीति निर्धारकों की तरह पेश आना पड़ेगा। 
संसदों की जननी कहीं जाने वाली घोर परंपरावादी हाउस ऑफ कॉमंस ने 22 अप्रैल को दूर संपर्क के जरिए अपनी पहली बैठक कर दिखाई ।प्रधानमंत्री का प्रश्नकाल नई शैली में होते हुए देखना एक सुखद अनुभव था। न कोई शोर न व्यवधान,  प्रधानमंत्री की ओर से भार साधक मंत्री ने जवाब दिए। सदन में कोरम के लिए जरूरी सदस्य संख्या मौजूद थी ।अध्यक्ष, सदन के क्लार्क और सदस्य गण अपेक्षित भौतिक दूरियां बनाकर सैनिटाइज किए माहौल में बैठे हुए थे। पूरी गंभीरता और तल्लीनता के माहौल में बाकी सदस्य अपने घरों या दफ्तर से इस टेली बैठक में जुड़े हुए थे। स्क्रीन पर नाम सहित उनके परिचय प्रदर्शित हो रहे थे, सदन की कार्यवाही का रिकॉर्ड रखा जा रहा था। अधिकारीगण भी इसी तरह जुड़ कर अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थे। कॉमन्स की इस ऐतिहासिक बैठक ने संसदीय विमर्श का एक बेहतर विकल्प पेश किया । 
हमारे देश में संसद और विधान मंडलों को इंटरनेट के जरिए जोड़ने की शुरुआत स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते ही हो गई थी। मध्यप्रदेश के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की पहल पर यह विषय उन दिनों अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में उठाया गया था ।तत्कालीन प्रधानमंत्री को यह प्रस्ताव इतना अच्छा लगा कि आगे जाकर सी नेट के जरिए संसद ग्रंथागार से मध्य प्रदेश के विधानसभा सचिवालय को जुड़ने का मौका भी मिला। इसी साल मध्यप्रदेश की विधानसभा की कार्यवाही को रेडियो से प्रसारित करने का उपक्रम हुआ। यह देश का पहला विधानमंडल था जिसने अपनी कार्यवाही को रियल टाइम प्रसारित करके विधानसभा के दरवाजे सबके लिए खोल दिए थे। समय के साथ बदलकर, नई तकनीक को अपनाकर और ज्यादा  संवेदनशील बनकर ही नई चुनौतियों का सामना किया जा सकता है ।
इसी सिलसिले में छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में ऑनलाइन मंत्रिपरिषद की बैठक रखकर एक कीर्तिमान रचा था। इसके बाद अन्य राज्यों में भी यह सिलसिला शुरू हो गया। प्रधानमंत्री जी ने पिछले दिनों देश के मुख्यमंत्रियों के साथ कई बार दूर संपर्क विधि से लाक डाउन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर विचार विनिमय किया। इन कोशिशों से देश में सकारात्मक माहौल बना है। लोगों को महसूस हो रहा है कि चुने हुए प्रतिनिधि न सही, सरकार के स्तर पर तो सब की राय लेकर चुनौती का सामना किया जा रहा है। लौक डाउन रहे या खुले, जनप्रतिनिधियों को अपनी जवाबदेही निभानी  ही होगी। इसको पूरा करने के लिए संसद और देश के विधान मंडलों को ,खासतौर पर संसदीय समितियों को फौरन सक्रिय होने की जरूरत है। नई दिल्ली या देश की राजधानियों में आवागमन बाधित होते हुए भी इन समितियों के सभापति, अध्यक्ष की इजाजत से ऐसी बैठकें ऑनलाइन आयोजित कर सकते हैं ।  जिला मुख्यालय पर उपलब्ध और पूरी तरह मुकम्मल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा का उपयोग करते हुए यह काम आसानी से किया जा सकता है। जहां लॉक डाउन खुल गया है वहां भी कामकाज में अपेक्षित  तेजी लाई जा सकती है ।इस चुनौती का सामना सबके सहयोग, खासतौर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की अतिरिक्त सक्रियता और भागीदारी से ही किया जा सकता है ।जरूरत है संकल्प शक्ति और नया कुछ कर दिखाने की।
 
(लेखक म प्र विधानसभा के सचिव और छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री के संसदीय सलाहकार रहे हैं) 
 
 
 
 

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